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Monday, 12 November 2012

ऐसी हो सब की दीवाली ....


ऐसी हो सब की दीवाली ..

एकता की लड़ी बने फुलझड़ी
भाव प्यार का बने अनार
उत्साह बने जीवन का दीपक
जोश की ज्योति बने चमक 
दुखों के अँधेरे का नाश हो
सुख , खुशियों का वास हो
मीठी बोली बने रंगोली
दीवाली हो या रंगों की होली
भ्रष्टाचार, जैसी बुराइयाँ मिटायें
सौहार्द की मिठास से मुंह मीठा कराएँ
शांति ,समृधि लेकर आये खुशहाली 
ऐसी हो आप सब की दीवाली
आओ सब मिलजुल कर दीप जलाएं
उमंग ,तरंग के रंग बिरंगे दीप जलाएं

Monday, 5 November 2012

आपकी ख्वाईश क्या है ...?

                   आपकी ख्वाईश क्या है ...?

ख्वाईशें ...कितना प्यारा शब्द है ,कितना गहरा भी ! हमारे मन से जुड़ा,हमारे मन की हर बात को एक स्वप्न का सा अंदाज़ देता हुआ !स्वप्न पूरा हो जाए तो भी हमारे मन के अन्दर एक और स्वप्न को जन्म दे जाता है !या यूँ कहिये कि कुछ पाने की अनवरत  इच्छा !यह भी एक पूरी हुई नहीं कि एक और खड़ी हो जाती है !और हम बेखबर से एक के बाद एक इच्छा के पूर्ण होने और फिर दूसरी के पूरे होने तक इन ईच्छाओ के मायाजाल में बंधते चले जाते हैं !रुक ही नहीं सकते न !इंसान हैं और मन तो अपने वश में नहीं ! वश में ही कर पाते तो इंसान थोड़े न रहते ,भगवान न बन जाते ? अब इच्छा कहो या ख्वाईश, है तो पूरी भी करनी है !चाहे कितना भी  वक्त लगे ,पैसा लगे ,श्रम लगे ..पूरी तो करनी ही है किसी भी कीमत पर !पर क्या हम जानते हैं इन ख्वाइशों को पूरा करने की दौड़ में हम खुद से ही कितने दूर होते जा रहे हैं ? न खुद की होश न परवाह, बस भौतिक सुख सुविधाओं को जुटाने ,बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाने की हौढ़ में ,अपना स्तर बढाने के लिए अपनों से ,आस पड़ोस वालो से ,दोस्तों से स्पर्धा में जी जान से जुटे ही रहते हैं !न जाने  कितनी ख्वाइशे या इच्छाएं जिनका कोई अंत नहीं और उनके लिए खुद का अंत ,इंसानियत का अंत ,रिश्तो का अंत तक करते रहते हैं हर पल हर कदम पर ! यह जो ख्वाईश शब्द है इसकी मिठास ,इसकी महत्ता, इसकी सौम्यता और इसकी रूमानियत सब खो गई है आज के भौतिक संसाधनों की चकाचौंध में ! एक वक़्त था जब इसी ख्वाईश शब्द का इस्तेमाल कुछ यूँ होता था ,''मेरी ख्वाईश है की मैं चाँद तारे तोड़ लाऊं तुम्हारे लिए '' या ''मेरी ख्वाईश है,मैं अपना पूरा प्यार  न्योच्छावर कर दूं तुम पर !'' या मेरी ख्वाईश है की मैं अपने देश के लिए अपनी जान दे दूं इत्यादि !परन्तु आज तो इसका स्वर्रूप  ही बदल गया है ! आज कुछ यूँ इसको परिभाषित करते हैं ..''मेरी ख्वाईश है कि मैं अपने बेटे को फलां के बेटे से भी अधिक पैसा ,शिक्षा या सुविधाएँ दूं  या फिर दिलो जान से की जाने वाली पाक मुहब्बत वासनाओं से ग्रसित ख्वाईश बन कर रह गई है ! देश के लिए जान देने की ख्वाईश अब कुर्सी पाने की ख्वाईश में ही सीमित हो गई है !यह है ख्वाईश का यथार्थ रूप !

                                           ऊपर वर्णित ख्वाईशों की जो भी हकीकत है, मैं भी उसी दुनिया में बसे इंसानों में से एक हूँ ! ख्वाईशे किसी न किसी रूप में आपके या मेरे दिल में अपने अपने भावों से विद्यमान हैं और इनसे इनकार करने की किंचित मात्र भी गुंजाइश नहीं है हमारे पास !लेकिन हम प्रयत्न तो कर सकते हैं न कि अपनी सुकून छिनती इच्छाओं को एक पूर्ण विराम दें !अपने ऊपर हावी न होने दें ! भौतिकता के धरातल से हटाकर अपनी ख्वाईशों को ज़िन्दगी के कुछ रंगीन पलों की फिर से वही रूमानियत दें जहाँ से इस शब्द का आगाज़ हुआ था !जब शायर ,लेखक ,प्रेमी लोग इस शब्द की रूह की भी तह तक जा कर इस को पूरा करने की न केवल हिम्मत  रखते थे बल्कि उस ख्वाईश को पूरा करने के लिए अपनी जान की बाज़ी तक लगा देते थे !हमें आज जान देने की ज़रुरत नहीं ,न ही हम सच पूछिए तो इतना कर सकते हैं !ज़रुरत है तो बस ख्वाईश को ख्वाईश बना रहने दें  ताकि एक एहसास बना रहे कि ''हाँ मेरी भी कोई ख्वाईश है ''!अपनी ख्वाईश को प्यार ,सदभावना,मौलिकता और हकीकत का जामा पहनाइए और लग जाइए इस शब्द की रूह को पहचानने में !ख्वाईशे हमारे ही मन का दर्पण होती हैं !जैसी ख्वाईश रखोगे वैसा ही उसका अक्स देख पाओगे !आवश्यकता केवल उसको सकारात्मकता देने की है नाकि प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ की ! 


                                              मैंने अपनी ख्वाईश को अपने शब्दों में ढालकर लेखनी द्वारा आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है ताकि मैं जितना समय कुछ  भौतिक सुख सुविधाओं को पाने के लिए सोचूं उससे बेहतर है अपना वही समय ज्ञान सीखने और  देने में ही लगा कर खुद को संतुष्ट कर सकूं ! 


आपकी ख्वाईश क्या है ? आपने क्या सोचा है ? जल्दी बताइयेगा !
                                                  
                                          
                                               

Sunday, 19 August 2012

नारी पर लेख - नारी की असली पहचान का कायल है समाज ?


ये  बात तब एक प्रश्नचिन्ह के साथ सामने आती है जब एक औरत अपने बच्चो को स्कूल से अपनी कार में लाते वक़्त ट्रेफिक सिग्नल के पास आगे पीछे खड़ी गाड़ियो में फंस जाती है और वहाँ से  निकलने की कोशिश करती है तभी एक दो और गाड़ियो में सवार सभ्य पुरुष बजाए उस महिला की मदद करने के, आँखे दिखाते अपनी बड़ी गाडी से निकलते हुए बोलते हैं कि ''मैडम जब गाडी चलानी नहीं आती तो चलाते ही क्यों हो? आ जाती हैं न जाने कहाँ कहाँ से ....रास्ता रोक के खड़ी हैं कब से ?हमे पहले ही इतनी देर हो गई है ,ये मैडम हैं कि और देर करवा रही हैं..!

इतने में आवाज़ सुनकर महिला ट्रेफिक पुलिस आती है और वहां से भीड़ को हटाने और उन् 'सभ्य 'कहलाने वाले पुरुष को शांति से नियम मानने का आदेश देती हैं और उस कार वाली महिला को अपनी गाडी निकलने का निर्देश देती है लेकिन यह सुनते ही वही व्यक्ति आग बबूला हो जाता है ..बिना जाने समझे की किसकी गाडी आगे है किसकी पीछे या ट्रेफिक महिला पुलिस के निर्देश को माने बिना बोलता जाता है ....वाह भई वाह !अरे  मैडम जी ये औरत न तो गाडी चला रही है न हमे आगे जाने दे रही है....और आप हो की उसको ही पहले जाने को बोल रही हो..ऐसा नहीं चलेगा....!हम लेट हो रहे हैं !और व्यर्थ ही गुस्से से उस महिला कार चालक से बदतमीज़ी पर उतर आया ...ओ मैडम !..नहीं  आती न तोह न चला ..घर में बैठ ...हट गाडी हटा ...! और उस व्यक्ति ने न तो  उस महिला कार चालक का ,न ही ट्रेफिक महिला पुलिस का सिर्फ उनका ''औरत '' होने की वजह से कुछ भी लिहाज़ किया !

तो प्रश्न उठता है कि क्या आज भी नारी कितनी भी आगे बढ जाए उसको वही सम्मान मिल पा रहा है ?क्या केवल पुरुष ही सही काम करते हैं?क्या उनको ही सिर्फ गाडी चलानी आती है और उनसे कोई गलती या दुर्घटना नहीं होती ?जहाँ जरा सी भी नारी से चूक हुई नहीं कि पुरुष वर्ग आँखे तरेर कर हाथ घुमा कर औरत को खरी खोटी सुनाने से बाज़ नहीं आता !क्या उस भीड़ में से कोई और पुरुष आगे आकर उस महिला की मदद करने और उस बदतमीज़ पुरुष को चुप करवाने नहीं आ सकता था?  नहीं...!क्यों कि सब को ही देर हो रही थी !या फिर वो शायद उस व्यक्ति की  अनजाने में ही हाँ में हाँ मिलाने की कवायद में थे ! 
ऐसा क्यों होता है कि पुरुष वर्ग महिला वर्ग को आगे बढता देख नहीं पाता? महिलाओ को आगे लाने और उनका  साथ देने की दलीले खोकली साबित क्यों  हो जाती हैं ? देश को आगे बढ़ाने में समाज का योगदान होता है और वही समाज केवल पुरुष प्रधान तो नहीं है ?उस में नारी का भी  तो बराबर का योगदान है !फिर हमारा समाज शहरो  कस्बो ,जिलो के मिश्रण से बना है पर अफ़सोस  कि समाज के इन्ही महत्पूर्ण हिस्सों के लोगो में औरत की स्तिथि  आज भी वही है  जहाँ छोटी से छोटी बातो के लिए भी औरत को ज़लील करने से  पुरुष पीछे नहीं हटता! नारी के अधिकारों की अवहेलना की जाती है ! कुछ भी अच्छा करना हो या नया करना हो तो शुरुआत अपने घर से ही की जाती है ताकि उस शुरुआत से बड़े परिवर्तन को आकार दिया जा सके !

फिर अगर अपने घर की नारी हो या  दुसरे घर की, नारी का अपमान करके  क्या एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है? नारी का मानसिक शोषण करना छोड़ कर उसके सहयोग से ही उसके अस्तित्व को स्वीकार कर के ही  एक स्वस्थ समाज की सरंचना हो सकती है !ऊपर वर्णित घटना मात्र एक छोटा सा उदाहरण है नारी के मानसिक शोषण का !जो नारी एक अच्छी पत्नी,माँ,बहन,के साथ साथ देश की बागडोर सँभालने और चांद की ऊँचाइयों को भी छूने की क्षमता रखती है क्या वो उस पुरुष को मुह तोड़ जवाब नहीं दे सकती थी? दे सकती थी ! पर चुप थी तो अपनी बगल में बैठे बच्चो को देख कर जो उस असभ्य व्यक्ति की आवाज़ सुनकर सहम गए थे और वो  औरत अपने बच्चो को प्यार से सहला रही थी या फिर वो खामोश थी तो अपने अन्दर निहित संस्कारो की वजह से क्यों कि वो उस असभ्य पुरुष से दो चार होकर खुद को असभ्य कहलाने से बच कर अपने बच्चो के साथ सुरक्षित अपनी मंजिल की ओर बढना चाहती थी !ये भी तो एक नारी के महान होने का सबूत है जहाँ  वो अपने व्यवहार ,अपनी ममता का लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटती